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भागवत कथा

छाल में आयोजित श्रीमद् भागवत संगीतमय ज्ञान यज्ञ भागवत सम्पन्न

तुलसी वर्षा सहस्त्र धारा हवन फूलों की होली चढ़ोतरी पुणे होती के साथ आनंद उत्सव मनाया गया

ब्रह्मोस न्यूज कुड़ेकेला। ग्राम बहेरामार विकासखंड धर्मजयगढ़ तहसील छाल मैं आयोजित श्रीमद् भागवत संगीतमय ज्ञान यज्ञ भागवत कथा 26 मार्च से प्रारंभ होकर 2 अप्रैल को तुलसी वर्षा सहस्त्र धारा हवन फूलों की होली चढ़ोतरी पुणे होती के साथ आनंद उत्सव मनाया गया। कथा व्यास पीठ पर विराजमान रमाकांत महाराज राष्ट्रीय भागवत आचार्य हरदी बाजार कोरबा वाले के द्वारा छत्तीसगढ़ी एवं हिंदी में सामंजस्य बनाते हुए भागवत ज्ञान यज्ञ कथा का रसपान कराया । कलश यात्रा वेदी पूजन के साथ ही कथा का आनंद लेते हुए श्रोताओं द्वारा महाभारत कथा परीक्षित श्राप सुकदेवआगमन सती प्रसंग ध्रुव चरित्र समुद्र मंथन वामन अवतार राम अवतार कृष्ण जन्म कथा का रसास्वादन किया। रमाकांत महाराज ने कथा सुनाते हुए बताया कि भगवान वस्तु नहीं भाव के भूखे हैं यदि भगवान किसी वस्तु रूपए पैसे के भूखे होते तो धनपतियों को पहले मिलते किंतु ऐसा कभी नहीं होता वह हमेशा व्यक्ति के भाव के भूखे होते हैं उनके भावपूर्ण भक्ति कर अमीर गरीब स्त्री पुरुष सभी वर्ण आश्रम के व्यक्ति भगवान को प्राप्त कर सकते हैं इस संसार में कोई कितना भी बड़ा व्यक्ति हो अपने साथ कुछ लेकर नहीं जाता अगर जाता है तो उसके साथ उसका अच्छा बुरा कर्म। कथा वाचक ने ध्रुव जी के वंशजों की कथा सुनाते हुए बताया कि हमारे देश में तीन भरत हुए एक भरत रामचंद्र जी के छोटे भाई जो भक्ति योग का पाठ सीखते हैं दूसरा शकुंतला नंदन भरत हुए जो कर्म योग की शिक्षा समाज को दिए और तीसरा जड़ भरत हुए जो श्रीमद भागवत में राजा रहूगण को ज्ञान योग की शिक्षा प्रदान करते हैं ।तीनों भारत के कारण इस आजनाम खंड का नाम भारतवर्ष पड़ा यह भारत भूमि धन्य है जहां देवता भी मनुष्य योनि पानी की याचना करते हैं। भगवान की बाल लीलाओं का सुंदर वर्णन करते हुए उनकी माखन लीला गोवर्धन पूजा रासलीला कंस वध रुक्मणी विवाह मंगल विवाह के अमृत रूपी कथा का रसपान कराते हुए कथा के अंतिम दिन श्री कृष्ण सुदामा के मित्रता की कथा सुनाते सबको भाव विभोर कर दिया। उन्होंने बताया रामावतार त्रेता युग में जो केवट था वही द्वापर कृष्ण अवतार में सुदामा के रूप में आए कृष्ण एवं सुदामा दोनों बचपन के मित्र थे एवं सांदीपनि आश्रम में शिक्षा ग्रहण करते थे गुरु माता ने उन्हें जंगल संमिधा लाने के लिए भेजा था एवं कुछ चने की पोटली दी थी। परम ज्ञानी सुदामा ने श्रापित चना जान सारे चैन खुद खा लिए और अपने मित्र को श्रापित चना खाने से बचा लिया। और पूरी गरीबी भोगने का भार अपने ऊपर ले लिया। यही कारण है कृष्ण तो राजा बन गए एवं सुदामा गरीब ब्राह्मण ।एक दिन उनकी पत्नी ने अपनी गरीबी का हवाला देते हुए सुदामा जी से कहा अपने मित्र से जाकर हमारे लिए कुछ मांग लो और कहीं से मांग कर तीन मुट्ठी चावल लेकर कृष्ण की नगरी में भेजा। जब सुदामा अपने मित्र से मिलने पहुंचे उनकी दिन दशा देखकर उनकी खूब और भगत की एवं कुछ दिन रुकने के बाद उन्हें उन्हीं के फटे पुराने कपड़े में विदा किया ।प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं दिया एवं अप्रत्यक्ष रूप से सब कुछ दे दिया ।श्री कृष्ण सुदामा की मित्रता की मिसाल खोजने से नहीं मिलेगी इसे कहते हैं मित्रता। कथा के अंतिम ।अवसर पर डायरेक्टर अनुज शर्मा के आने वाली छत्तीसगढ़ी मूवी सुहाग जो 18 अप्रैल को रिलीज होने वाली है के लिए महाराज जी से आशीर्वाद लिए एवं उसकी कुछ बानगी पेश की।

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