भद्रा के पूंछकाल में 7 बजे से 8:20 में कर सकेंगे होलिका दहन

शुद्ध रूप में रात 11:32 में होगा होलिका दहन
ब्रह्मोस न्यूज रायगढ़। फाल्गून मास के अष्टमी को जहां होलाष्टक शुरू हो जाता है । वही आज 13 मार्च गुरुवार को होलाष्टक के प्रभाव रात 11:32 बजे समाप्त हो जाएगा। इसके बाद ही होलिका दहन का शुभ मुहूर्त होगा। इससे पहले कोई भी शुभ एवं मंगलकारी कार्य नही हो सकेंगे।

इस मामले मे पंडरीपानी पूर्व के श्री महालक्ष्मी मंदिर के संस्थापक ज्योतिषाचार्य पंडित रवि भूषण शास्त्री की माने तो फाल्गून मास के होलाष्टक लगने के बाद अगर शुभ कार्य की जाती है तो वह मंगल कारी न होकर अनिष्टकारी हो जाता है। उसमें किसी न किसी प्रकार से विघ्न होता ही रहता है। इस लिहाज से होलाष्ट समाप्त होने के बाद ही रात के 11:32 के बाद होलिका दहन हो सकेगा। उन्होंने यह भी बताया कि भद्रा के दो स्वरूप होते है मुख काल तथा पूछकाल , पुछ काल मे 7 बजे से लेकर 8:20 में भी होलिका दहन किया जा सकता है।गौरतलब है कि होलिका दहन की तैयारी शुरू हो चूकी है और भक्त प्रहलाद के प्रतिक होली का झंडा गाढ दिया गया है। ऐसे में इस साल आज 13 मार्च को होलिका दहन और कल शुक्रवार को घूरेंडी यानी होली खेला जाएगा परंतु आज भी फिलहाल होलाष्टक लगा हुआ है और यही वजह है कि भद्रा का साया होने से रात के 11:32 के बाद ही शुद्ध होलिका दहन हो पायेगा।
आज 11:32 तक रहेगा भद्राकाल का साया
ज्योतिष शास्त्र का कहना है कि इन दिनों में वातावरण में नेगेटिव एनर्जी काफी रहती है। होलाष्टक के अष्टमी समाप्त होने तक अलग-अलग ग्रहों की नकारात्मकता काफी बढ़ी रहती है। इस कारण इन दिनों में शुभ कार्य नही किया जाता।
इस तरह पूजा करने से कट जायेगे सारे अनिष्ट
खास बात यह है कि होलिका का पूजा पाठ में भी बहुत से अनिष्ट को काटने का उपाय होता है। जिसमें ज्योतिष्चार्य पंडित रवि भूषण शास्त्री के अनुसार अगर होलिका में डालने वाले गोबर के 7 कांडों को अगर घर का मुखिया अपने और परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर 7 बार वार कर होलिका में अर्पित कर दे तो उसके घर की सभी दुःख व निगेटिविटी होलिका में जल कर नष्ट हो जायेंगे।
क्या कहते है ज्योतिष्चार्य
फाल्गून मास के अष्टमी को रात 11:32 में होलाष्टक का प्रभाव समाप्त हो जाएगा है। इसके अलावा भद्रा के पूछ काल मे रात 7 बजे से 8:20 तक होलिका दहन किया जा सकेगा ।
ज्योतिष्चार्य पंडित रवि भूषण शास्त्री
महालक्ष्मी मंदिर पंडरी पानी के संस्थापक